जुलाई 3, 2026 से मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों की सीमा पर, पन्ना के कुपी गांव और बराना नदी के
किनारे केन-बेतवा लिंक परियोजना, रूंज बांध और मझगांय बांध से प्रभावित विस्थापितों का आंदोलन को पुलिस द्वारा जबरन खत्म कर दिया गया है। प्रभावित परिवार चिता आंदोलन, जल सत्याग्रह, मिट्टी सत्याग्रह, फांसी और सूली सत्याग्रह के साथ आमरण अनशन कर रहे हैं। उनकी मांग है कि उन्हें पारदर्शी मुआवजा, जमीन के बदले जमीन, पक्का पुनर्वास और महिलाओं को भी कुटुंब पैकेज का अधिकार मिले।
सरकार ने पुनर्वास पैकेज बढ़ाने की घोषणा की है लेकिन आंदोलनकारियों का कहना है कि जब तक जमीन पर न्याय नहीं मिलेगा तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे अमित भटनागर कई दिन से भूख हड़ताल पर हैं।
यह आंदोलन अचानक शुरू नहीं हुआ है इसकी शुरुआत साल 2022 से ही परियोजना की घोषणा और जमीन पर काम शुरू होने के बाद से ही प्रभावित इलाकों में विरोध की आवाजें उठती रही हैं। इस साल 2026 में पिछले कुछ महीनों में यह विरोध तेज हुआ और अब छतरपुर, पन्ना तथा आसपास के इलाकों में ग्रामीण अलग-अलग तरीकों से अपनी बात रख रहे हैं। अप्रैल 2026 में आंदोलन तेज होने के बाद जुलाई में फिर से आंदोलन शुरू हो गया है।
केन-बेतवा परियोजना क्या है?
केन-बेतवा लिंक परियोजना दो बड़ी नदी केन और बेतवा नदी को मिलाकर बनने वाली परियोजना है। केन नदी मध्य प्रदेश के कटनी जिले के पास से निकलती है। यह पन्ना, छतरपुर और दमोह जिलों से होकर बहती है और आगे उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में जाकर यमुना नदी में मिल जाती है। केन नदी अपनी साफ धारा और पन्ना टाइगर रिजर्व से होकर गुजरने के लिए भी जानी जाती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिसंबर 25, 2024 को केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट (KBLP) को हरी झंडी दिखाई थी। इस योजना के तहत केन नदी का पानी पाइपलाइन और नहरों के माध्यम से बेतवा नदी तक पहुंचाया जाएगा, ताकि बुंदेलखंड जैसे सूखा प्रभावित इलाकों में पानी की कमी दूर की जा सके। इस परियोजना की अनुमानित लागत 44,605 करोड़ रुपये है।
सरकार का कहना है कि परियोजना पूरी होने के बाद इससे करीब 10.62 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई हो सकेगी, लगभग 62 लाख लोगों को पीने का पानी मिलेगा और 130 मेगावाट बिजली का उत्पादन भी होगा।
सरकार के अनुसार, इस परियोजना से बुंदेलखंड में खेती को फायदा होगा, पानी की उपलब्धता बढ़ेगी और क्षेत्र के विकास को नई गति मिलेगी।
लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है जहां एक तरफ सरकार विकास के नाम पर इस परियोजना का काम कर रही है वहीं इससे कई लोगों की जमीन और आजीविका का साधन भी उनसे छीन गया है। इसी के साथ उन्हें उचित मुआवजा भी नहीं मिला जिसकी वजह से उन्हें मजबूरन आंदोलन करना पड़ रहा है। जब से यह परियोजना चर्चा में आई थी तभी से इसका विरोध बुंदेलखंड के लोग करते आ रहे हैं। खबर लहरिया ने केन बेतवा परियोजना से प्रभावित लोगों की समस्या और उनके विरोध की जमीनी रिपोर्टिंग भी उसी समय से जारी है।

जुलाई 2026: ग्रामीणों का जोरदार प्रदर्शन
छतरपुर जिले के कई गांव जो पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर एरिया के पास बसे हैं इस परियोजना के अंदर आ रहे हैं। यहां बांध बनने के बाद नहरों के जरिए पानी बेतवा नदी तक ले जाया जाएगा जिससे इन गांवों के डूबने का खतरा है। प्रमुख विस्थापित गांवों में भरकुआं, ढोढन खरियानी, कुपी, मैनारी, पलकोंहा, शाहपुरा, सुकवाहा, पाठापुर, नैगुवां, डुंगरिया, कदवारा, घुघरी, और बसुधा शामिल हैं।
इस महीने यह आंदोलन जुलाई 3, 2026 को दूसरी बार शुरू हुआ इससे पहले अप्रैल 2026 में लोगों ने इसी तरह का आंदोलन किया था। मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों की सीमा पर, पन्ना के कुपी गांव और बराना नदी के किनारे केन-बेतवा लिंक परियोजना, रूंज बांध और मझगांव बांध से प्रभावित विस्थापितों का संयुक्त आंदोलन जारी है।

केन-बेतवा लिंक परियोजना आंदोलन की ताकत महिलाएं
इस आंदोलन की खास बात यह है कि इसमें महिलाऐं भी उतर आई हैं जो खासकर आदिवासी समुदाय से हैं। महिलाऐं भी प्रतीकात्मक चिता पर लेटी दिखाई दीं, साथ ही पानी में घुसकर आंदोलन को मजबूत किया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में भी यह इसलिए जगह बना पाया क्योंकि इन ग्रामीणों ने आंदोलन करने का नया तरीका अपनाया ताकि सरकार की नज़रों में आ सके और उनकों अपनी परेशानी समझा सके। पर अफ़सोस सरकार की तरफ से अभी तक इस आंदोलन का जवाब नहीं मिला है जबकि स्थानीय पत्रकार और कुछ मुख्यधारा की मीडिया भी यहां तक पहुँच गई है।
आसपास के लगभग बीस गाँवों की महिलाओं ने एकजुट होकर इस परियोजना का विरोध किया और लगातार धरना-प्रदर्शन कर इसे आगे बढ़ने से रोक रखा है। अपने हक और भविष्य की सुरक्षा के लिए खड़ी ये महिलाएँ अब संघर्ष की सबसे मजबूत आवाज़ बन चुकी हैं।
पूरा विवाद फरवरी 6, 2026 से शुरू हुआ जब परियोजना से प्रभावित महिलाओं ने बांध का काम रुकवा दिया। उनका कहना था कि जब तक मुआवजा और पुनर्वास की साफ गारंटी नहीं मिलेगी तब तक निर्माण कार्य नहीं होने दिया जाएगा। तीन दिन बाद फरवरी 9 को आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता भटनागर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। पहले कहा गया कि उनसे पूछताछ होगी लेकिन बाद में उन्हें जेल भेज दिया गया। इसके बाद 20 से ज्यादा गांवों के लोग आंदोलन में शामिल हो गए और हजारों की संख्या में ग्रामीण जिनमें अधिकतर महिलाएं थीं विजावर तहसील कार्यालय पहुंचकर धरने पर बैठ गए।
खतरों के बीच रहने को मजबूर
जैसे जैसे परियोजना का काम आगे बढ़ रहा है वैसे वैसे विरोध प्रदर्शन और तेज होता जा रहा है। खबर लहरिया की हाल कि रिपोर्टिंग में आप देख सकते हैं छतरपुर जिले के पूँछी गांव में छतरपुर और पन्ना जिले के लोग यहां मौजूद हैं। यहीं पर वह खाना बना रहे हैं, सो रहे हैं, नहा रहे हैं और अपनी जमीन के लिए लड़ रहे हैं। प्यारी बाई जो पालकुआं गांव से यहां आई हुई हैं कहती हैं, “यहां रात में बिच्छू और सांप का खतरा रहता है सांप बिस्तर में घुस जाते हैं।”
किसान संगठन अध्यक्ष अमित भटनागर का मिट्टी सत्याग्रह
जुलाई 14, 2026 को आंदोलन के दौरान किसान संगठन के अध्यक्ष भटनागर भी दिखाई दिए। वह यहां पर आमरण अनशन और मिट्टी सत्याग्रह कर रहे हैं। आप उन्हें नीचे दिए गए वीडियो में सुन सकते हैं और देख सकते हैं वह अपने शरीर पर मिट्टी लगाए हुए पानी में लेटे हुए हैं।
भटनागर कहते हैं कि “हम आंदोलन 4 साल से कर रहे हैं केन बेतवा लिंक परियोजना और विभिन्न परियोजना में किसानों की जमीन जा रही है। उनसे जल,जंगल, जमीन, उनकी आजीविका, संस्कृति सब छीनी है लेकिन लोगों को न्याय नहीं दिया जा रहा है। यहां कानून का कोई पालन नहीं हो रहा है। ग्राम सभाएं भी फर्जी तरीके से कर ली गई है। उनका मुआवजा अपात्र लोगों के खाते में डाल दिया जा रहा है।”
आंदोलन कर रहे लोगों की प्रमुख मांगें हैं—
- प्रभावित परिवारों को उचित और पारदर्शी मुआवजा दिया जाए।
- सभी विस्थापित परिवारों का सम्मानजनक पुनर्वास किया जाए।
- जमीन, जंगल और आजीविका से जुड़े अधिकारों की रक्षा की जाए।
- परियोजना से जुड़े सभी दस्तावेज और फैसले ग्रामीणों के सामने स्पष्ट किए जाएं।
- जब तक समस्याओं का समाधान न हो, तब तक विस्थापन और निर्माण प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए।
लोगों की मांग है कि उन्हें पारदर्शी मुआवजा, जमीन के बदले जमीन, पक्का पुनर्वास और महिलाओं को भी कुटुंब पैकेज का अधिकार मिले। सरकार ने पुनर्वास पैकेज बढ़ाने की घोषणा की है, लेकिन आंदोलनकारियों का कहना है कि जब तक जमीन पर न्याय नहीं मिलेगा, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।
सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर को किया था गिरफ्तार
केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट का विरोध करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर काफी समय से केन-बेतवा लिंक परियोजना और रुंझ डैम से प्रभावित आदिवासी परिवारों के समर्थन में आवाज उठा रहे थे। वे पुनर्वास, मुआवजा और वन अधिकारों को लेकर आंदोलन कर रहे थे। मई 8, 2026 को प्रदर्शन के दौरान आंदोलन के नेता भटनागर समेत 9 किसानों को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के विरोध में जिले के कई गांवों से हजारों किसान सड़कों पर उतर आए और पन्ना एसपी कार्यालय का घेराव कर रातभर धरना दिया। आंदोलन को राजनीतिक समर्थन भी मिलने लगा है। इसी बीच सोमवार को जेल से बाहर आने के बाद उनके अचानक गायब होने की खबर सामने आई जिसके बाद पूरे मामले ने और ज्यादा तूल पकड़ लिया।
मई 2026 में चिता आंदोलन में बुलडोजर कार्रवाई
मध्य प्रदेश में केन-बेतवा लिंक परियोजना के खिलाफ चल रहे आंदोलन की रिपोर्टिंग और आंदोलनकारी नेता अमित भटनागर से बातचीत करने पर जानकारी मिली कि यहां मई 13, 2026 को जिस जगह ग्रामीण और प्रदर्शनकारी विरोध कर रहे थे वहां प्रशासन ने प्रदर्शन के लिए बनाई गई चिता को जला दिया। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इस दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज भी किया।

साल 2022 में केन बेतवा लिंक परियोजना के कारण लोगों का विस्थापन
केन बेतवा लिंक परियोजना आने से विस्थापित लोगों की चिंता बढ़ गई थी और खबर लहिरया ने इसे साल 2022 में रिपोर्ट किया था। जिला छतरपुर, ब्लाक विजावर, गांव ढोड़न में लोग अपनी जमीन परियोजना में जाने को लेकर चिंतित दिखाई दिए और सरकार से उचित मुआवजा कम से कम 20 लाख की मांग की। गांव केन बेतवा लिंक परियोजना के तहत बनने वाले बांध के क्षेत्र के किनारे बसे हैं। ऐसे में यह गांव डूब क्षेत्र में आने के कारण लोगों का विस्थापन किया जाएगा। मतलब कि पूरी आबादी को दूसरी जगह पर रहने को भेजा जाएगा जिसके लिए सरकार मुआवजा देगी। आप नीचे दिए गए वीडियो में इसे देख सकते हैं।
साल 2023 में सरकार द्वारा नोटिस जारी कर खाली करने को कहा
खबर लहरिया की साल 2023 में केन बेतवा लिंक परियोजना से पन्ना-छतरपुर जिले के कई गाँवो के लोगों को सरकार द्वारा विस्थापित होने को कहा गया था। 60 साल की बुजुर्ग जानकीबाई कहती हैं कि “तीन चार पीढ़ी बीत गईं गांव को बसे हुए तब से विस्थापन की बात चल रही है। अब फर्क ये है कि पहले जंगल विभाग वाले कहते थे और अब डीएम, एसडीएम कह रहे हैं। हम चले जायेंगे लेकिन पहले मुआवजा चाहिये। हमारी भूमिधरी जमीन है कैसे छोड़े। सरकार भगा रही है तो जाना ही पड़ेगा वरना अपना घर बार जमीन छोड़कर जाने का मन नहीं कर रहा है।”
दसिया बताई हैं कि इतनी अच्छी खेती को कैसे छोड़े। बहुत अच्छी फसल होती है क्योंकि हमारे खेतों में केन नदी की उपजाऊ मिट्टी आती है उससे बिना ज्यादा मेहनत किया फसल तैयार हो जाती है। सबसे ज्यादा राई मतलब सरसो की पैदावार होती है। चार हिस्सेदार के बीच आठ एकड़ खेती है। साल भर के खाने को हो जाता है।
साल 2025 में परियोजना के तहत सड़क निर्माण के लिए विरोध
खबर लहरिया की साल 2025 अप्रैल की रिपोर्ट में छतरपुर जिले के झुमकी गांव में केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत बनाई जा रही सड़क को लेकर ग्रामीणों में आक्रोश दिखाई दिया था। ग्रामीणों का आरोप था कि यह सड़क घर और आबादी के बीच से निकाली जा रही है, जिससे 150-200 परिवारों के घरों पर खतरा मंडरा रहा है। यदि सड़क इसी मार्ग से बनी, तो कई लोग बेघर हो जाएंगे और उनकी जीवनभर की जमा पूंजी मिट्टी में मिल जाएगी।
सिर्फ केन-बेतवा नहीं, दूसरी परियोजनाओं को लेकर भी नाराजगी
इस आंदोलन में केवल केन-बेतवा लिंक परियोजना ही मुद्दा नहीं है। पन्ना और आसपास के क्षेत्रों में प्रभावित लोग अन्य सिंचाई परियोजनाओं को लेकर भी अपनी आपत्तियां उठा रहे हैं। इनमें मझगाय मध्यम सिंचाई परियोजना और रूंज (Rūnj) मध्यम सिंचाई परियोजना जैसे प्रोजेक्ट शामिल हैं, जिनसे प्रभावित किसानों और आदिवासी परिवारों ने भी अपनी मांगें रखी हैं।
केन-बेतवा लिंक परियोजना में शमिल संगठन
जमीनी स्तर पर किसान समूह, आदिवासी संगठन और स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता इस आंदोलन से जुड़े हैं। जय किसान संगठन जैसे स्थानीय संगठनों ने प्रभावित किसानों की मांगों को उठाया है। इसके अलावा पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों से जुड़े कई समूहों ने भी इस आंदोलन के समर्थन में आवाज उठाई है।
आखिर सवाल विकास का नहीं, विकास के तरीके का है
केन-बेतवा परियोजना को लेकर विवाद यह नहीं है कि बुंदेलखंड को पानी चाहिए या नहीं। हर कोई मानता है कि इस क्षेत्र को जल संकट से राहत चाहिए। असली सवाल यह है कि विकास की इस यात्रा में जिन लोगों की जमीन और जिंदगी प्रभावित हो रही है, उन्हें कितना न्याय मिलता है।
एक तरफ सरकार इसे बुंदेलखंड के भविष्य की बड़ी उम्मीद बता रही है, तो दूसरी तरफ ग्रामीण अपने वर्तमान को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। आने वाले समय में इस आंदोलन का समाधान तभी संभव होगा जब विकास और विस्थापन के बीच ऐसा रास्ता निकले, जिसमें पानी भी मिले और लोगों का भरोसा भी बना रहे।